১০০

পরিচ্ছেদঃ

১০০। আবদুল্লাহ ইবনুস সা’দী জানিয়েছেন যে, তিনি উমার (রাঃ) এর খিলাফতকালে তার কাছে এলে উমার (রাঃ) তাঁকে বললেনঃ আমাকে কি এ কথা বলা হয়নি যে, তুমি জনগণের বিভিন্ন (সেবামূলক) কাজ কর, তারপর তোমাকে তার পারিশ্রমিক দেয়া হলে তা অপছন্দ কর? (অর্থাৎ এ কথা কি সত্য?) আমি (আবদুল্লাহ ইবনুস সাদী) বললামঃ হ্যাঁ। উমার (রাঃ) বললেনঃ তাহলে তুমি কি চাও? আমি বললামঃ আমার প্রচুর ঘোড়া ও দাসদাসী আছে। আমি সচ্ছল, আমি চাই, আমার পারিশ্রমিক মুসলিমদের জন্য সাদাকা হয়ে যাক। উমার (রাঃ) বললেনঃ এরূপ করো না। কারণ তুমি যা চেয়েছে, আমিও তা করতে চেয়েছিলাম। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে কিছু দান করতেন। তখন আমি বলতাম, এটি এমন কাউকে দিন, যে এর প্রতি আমার চেয়েও বেশি মুখাপেক্ষী। একবার তিনি আমাকে একটা সম্পত্তি দিলেন। আমি বললাম, এ সম্পত্তি আমার চেয়েও যার বেশি প্রয়োজন, তাকে দিন। রাসূলুল্লাল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেনঃ এটা নিয়ে নাও, এ দ্বারা আরো সম্পদ উৎপন্ন কর এবং সাদাকা কর। এই সম্পদ থেকে যা অযাচিতভাবেই তোমার হাতে আসে, তা নিয়ে নাও। আর যা আসেনা, তার প্রত্যাশী হয়োনা। (অর্থাৎ কখনো যদি কাজ করেও তার পারিশ্রমিক না জোটে, তবে তার জন্য পীড়াপীড়ি করো না। -অনুবাদক)[১]

حَدَّثَنَا أَبُو الْيَمَانِ، قَالَ: أَخْبَرَنَا شُعَيْبٌ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، قَالَ: أَخْبَرَنَا السَّائِبُ بْنُ يَزِيدَ ابْنُ أُخْتِ نَمِرٍ، أَنَّ حُوَيْطِبَ بْنَ عَبْدِ الْعُزَّى أَخْبَرَهُ أَنَّ عَبْدَ اللهِ بْنَ السَّعْدِيِّ أَخْبَرَهُ: أَنَّهُ قَدِمَ عَلَى عُمَرَ بْنِ الْخَطَّابِ فِي خِلافَتِهِ، فَقَالَ لَهُ عُمَرُ: أَلَمْ أُحَدَّثْ أَنَّكَ تَلِي مِنْ أَعْمَالِ النَّاسِ أَعْمَالًا، فَإِذَا أُعْطِيتَ الْعُمَالَةَ كَرِهْتَهَا؟ قَالَ: فَقُلْتُ: بَلَى، فَقَالَ عُمَرُ: فَمَا تُرِيدُ إِلَى ذَلِكَ؟ قَالَ: قُلْتُ: إِنَّ لِي أَفْرَاسًا وَأَعْبُدًا، وَأَنَا بِخَيْرٍ، وَأُرِيدُ أَنْ تَكُونَ عَمَالَتِي صَدَقَةً عَلَى الْمُسْلِمِينَ. فَقَالَ عُمَرُ: فَلا تَفْعَلْ، فَإِنِّي قَدْ كُنْتُ أَرَدْتُ الَّذِي أَرَدْتَ، فَكَانَ النَّبِيُّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يُعْطِينِي الْعَطَاءَ، فَأَقُولُ: أَعْطِهِ أَفْقَرَ إِلَيْهِ مِنِّي، حَتَّى أَعْطَانِي مَرَّةً مَالًا، فَقُلْتُ: أَعْطِهِ أَفْقَرَ إِلَيْهِ مِنِّي، قَالَ: فَقَالَ لَهُ النَّبِيُّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: " خُذْهُ فَتَمَوَّلْهُ، وَتَصَدَّقْ بِهِ، فَمَا جَاءَكَ مِنْ هَذَا الْمَالِ، وَأَنْتَ غَيْرُ مُشْرِفٍ وَلا سَائِلٍ، فَخُذْهُ، وَمَا لَا، فَلا تُتْبِعْهُ نَفْسَكَ

إسناده صحيح على شرط الشيخين. أبو اليمان: هو الحكم بن نافع، وشعيب: هو ابن أبي حمزة

وأخرجه الدارمي (1648) ، والبخاري (7163) ، والنسائي 5 / 104 عن أبي اليمان، بهذا الإسناد

وأخرجه الحميدي (21) ، ومسلم (1045) (111) ، والنسائي 5 / 103 و104، وابن خزيمة (2365) و (2366) ، والبزار (244) من طرق عن الزهري، به. إلا أن مسلماً لم يذكر في حديثه حويطب بن عبد العزَّى

وأخرجه عبد الرزاق (20045) عن معمر، عن الزهري، السائب بن يزيد قال: لقي عمر بن الخطاب عبد الله بن السعدي ... فذكره. وانظر الحديث رقم (136) و (371)
العُمالة - بالضم : أجرة العمل، وبفتح العين: العمل نفسه، فتموَّله: أي اجعله لك مالاً. غير مشرف: غير متطلع إليه، ولا طامع فيه

حدثنا أبو اليمان، قال: أخبرنا شعيب، عن الزهري، قال: أخبرنا السائب بن يزيد ابن أخت نمر، أن حويطب بن عبد العزى أخبره أن عبد الله بن السعدي أخبره: أنه قدم على عمر بن الخطاب في خلافته، فقال له عمر: ألم أحدث أنك تلي من أعمال الناس أعمالا، فإذا أعطيت العمالة كرهتها؟ قال: فقلت: بلى، فقال عمر: فما تريد إلى ذلك؟ قال: قلت: إن لي أفراسا وأعبدا، وأنا بخير، وأريد أن تكون عمالتي صدقة على المسلمين. فقال عمر: فلا تفعل، فإني قد كنت أردت الذي أردت، فكان النبي صلى الله عليه وسلم يعطيني العطاء، فأقول: أعطه أفقر إليه مني، حتى أعطاني مرة مالا، فقلت: أعطه أفقر إليه مني، قال: فقال له النبي صلى الله عليه وسلم: " خذه فتموله، وتصدق به، فما جاءك من هذا المال، وأنت غير مشرف ولا سائل، فخذه، وما لا، فلا تتبعه نفسك إسناده صحيح على شرط الشيخين. أبو اليمان: هو الحكم بن نافع، وشعيب: هو ابن أبي حمزة وأخرجه الدارمي (1648) ، والبخاري (7163) ، والنسائي 5 / 104 عن أبي اليمان، بهذا الإسناد وأخرجه الحميدي (21) ، ومسلم (1045) (111) ، والنسائي 5 / 103 و104، وابن خزيمة (2365) و (2366) ، والبزار (244) من طرق عن الزهري، به. إلا أن مسلما لم يذكر في حديثه حويطب بن عبد العزى وأخرجه عبد الرزاق (20045) عن معمر، عن الزهري، السائب بن يزيد قال: لقي عمر بن الخطاب عبد الله بن السعدي ... فذكره. وانظر الحديث رقم (136) و (371) العمالة - بالضم : أجرة العمل، وبفتح العين: العمل نفسه، فتموله: أي اجعله لك مالا. غير مشرف: غير متطلع إليه، ولا طامع فيه

হাদিসের মানঃ সহিহ (Sahih)
পুনঃনিরীক্ষণঃ
মুসনাদে আহমাদ
মুসনাদে উমার ইবনুল খাত্তাব (রাঃ) [উমারের বর্ণিত হাদীস] (مسند عمر بن الخطاب)